शाबर साधना में अनुभूति क्यों नहीं होती? अनुभूति प्राप्त करने का गूढ़ रहस्य

शाबर साधना में अनुभूति प्राप्त करने की विधि और काली साधना का रहस्य
शाबर साधना में अनुभूति प्राप्त करने के लिए एकांत, आत्मबल और सही दृष्टि अत्यंत आवश्यक है।

साधना जगत में प्रवेश करने वाला लगभग हर साधक कभी न कभी इस प्रश्न से जूझता है—
“मैं वर्षों से साधना कर रहा हूँ, फिर भी कोई अनुभूति क्यों नहीं होती?”

चाहे वह शाबर साधना हो, मंत्र-जप हो या देवी-उपासना—
यदि साधक को न तो ऊर्जा का अनुभव हो, न ही भीतर कोई परिवर्तन दिखाई दे, तो मन में निराशा उत्पन्न होना स्वाभाविक है।

आज की यह चर्चा केवल उन्हीं साधकों के लिए है जो लंबे समय से साधना पथ पर हैं, लेकिन अभी तक किसी ठोस अनुभूति से वंचित हैं।

क्या आप केवल कौतूहल से साधना कर रहे हैं?

सबसे पहले एक बात स्पष्ट कर देना आवश्यक है—

यदि आप इस प्रकार की साधनाओं को – “चलो इसे भी करके देख लेते हैं” या “देखते हैं क्या होता है”

इस कौतूहल की मानसिकता से करते हैं, तो यह मार्ग आपके लिए नहीं है।

शाबर साधनाएँ ऊर्जा-आधारित होती हैं, और ऊर्जा के साथ लापरवाही कभी सुरक्षित नहीं होती।
यदि किसी प्रकार की हानि होती है, तो उसकी जिम्मेदारी साधक स्वयं की होती है।

इस साधना के लिए आवश्यक मानसिक योग्यताएँ

यह साधना हर किसी के लिए नहीं है। इसे करने से पहले स्वयं से ईमानदारी से पूछें:

  • क्या आपका आत्मबल मजबूत है?

  • क्या आप एकांत में बिना भय के बैठ सकते हैं?

  • क्या आपको अंधकार, सन्नाटा या निर्जन स्थान से अत्यधिक डर नहीं लगता?

  • क्या आपके आसपास ऐसा स्थान उपलब्ध है?

यदि इन प्रश्नों में किसी का उत्तर “नहीं” है,
तो बेहतर है कि आप सरल साधनाओं का चयन करें, जिनके अनेक मार्ग पहले से उपलब्ध हैं।

साधना के लिए उपयुक्त समय और स्थान

समय

  • अमावस्या की रात्रि

  • या मंगलवार की रात्रि

  • रात्रि 10:00 बजे के बाद

स्थान
जितना अधिक एकांत, उतना अधिक लाभ—

  • देवी स्थान

  • पीपल, नीम या बरगद वृक्ष के नीचे

  • नदी का एकांत किनारा

  • कोई सुनसान या निर्जन स्थान

  • ऐसा स्थान जहाँ सामान्यतः उस समय लोगों का आना-जाना न हो

स्थान को पहले से साफ़ करके तैयार करना अनिवार्य है।

साधना से पूर्व आवश्यक तैयारी

मुख्य साधना से पहले:

  • यदि आपने पहले कोई रक्षा-बन्धन, कवच या सुरक्षा पाठ सीखा है, तो उसे अवश्य करें

  • अपनी क्षमता अनुसार कम से कम 135 बार कवच पाठ करें

  • इसके बाद भगवती कालिका का मानसिक स्मरण करें

कातर भाव से माता से प्रार्थना करें—

“माता, साधना पथ पर बहुत समय हो गया है।

आज कुछ न कुछ अनुभूति अवश्य कराइए।”

यह भाव अत्यंत महत्वपूर्ण है।

पूजन सामग्री (दक्षिणाचार के लिए)

यदि आप दक्षिणाचार परंपरा का पालन करते हैं, तो सामग्री इस प्रकार हो सकती है:

  • नारियल

  • फूल

  • सिंदूर

  • कपूर

  • लौंग

  • इलायची

  • जायफल

  • दीपक

इन सभी को विधि अनुसार भगवती को अर्पित करें।

वामाचार पद्धति के साधक अपनी परंपरा के अनुसार सामग्री अर्पित करें।

मंत्र जप की विधि

  • मंत्र का कोई निश्चित संख्या-बंधन नहीं है

  • कम से कम 2 से 3 घंटे तक एक ही स्थान पर बैठकर जप करें

  • जप के दौरान उठें नहीं, इधर-उधर देखें नहीं

  • जो भी अनुभूति हो, उसे शांत भाव से स्वीकार करें

कुछ समय बाद साधक को—

  • असामान्य अनुभूति

  • वातावरण में परिवर्तन

  • ऊर्जा की उपस्थिति

  • भीतर किसी हलचल का अनुभव

हो सकता है।

डरना नहीं है—
यदि डर है, तो यह साधना न करें।

अनुभूति का प्रचार न करें

जो भी अनुभूति हो—

  • उसका ढिंढोरा न पीटें

  • स्वयं को “सिद्ध” घोषित न करें

  • इसे केवल अपने तक सीमित रखें

साधना का उद्देश्य अहंकार नहीं, बल्कि आंतरिक परिवर्तन है।

कितने दिन करें यह साधना?

आप इस प्रक्रिया को—

  • लगातार 5 दिन

  • या 5 अमावस्या

  • या 5 मंगलवार

तक कर सकते हैं।

अनुभवी साधकों का अनुभव है कि
इन पाँच अवसरों में जो अनुभूति होती है,
वह कई वर्षों की साधना के बराबर हो सकती है।

शुद्ध शाबर मंत्र

शुद्ध मंत्र पाठ नीचे दिया गया है:

“गाँव के कोने पीपर के गाछ ताहि चढ़ि काली करे हांक । मद्य मांस भखे आपन जियावे पराया खाय । शत्रु खाये मित्र जियाय । सत्य प्रत्यक्ष ॥”

अंतिम चेतावनी और शुभकामना

यह साधना साहस, संयम और श्रद्धा की मांग करती है।
यदि आप मानसिक रूप से तैयार नहीं हैं, तो इसे न करें।

लेकिन यदि आप वर्षों से साधना पथ पर हैं और
सच में भगवती काली की कृपा और अनुभूति चाहते हैं—
तो यह मार्ग आपके लिए उपयोगी सिद्ध हो सकता है।

मेरी ओर से आपको साधना पथ में शुभकामनाएँ।

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