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काली माता | KALI MATA - भक्त की रक्षा करने वाली

काली माता | KALI MATA :  प्रथम महाविद्या काली को, आद्य महाविद्या भी कहा जाता है और इन्हें प्रथम स्थान दिया गया है। इन्हें भगवान विष्णु की योगनिद्रा भी कहते हैं। किसी भी महाविद्या की माया, उनकी महिमा का मंडन एवं उनपर विस्तृत ज्ञान ग्रन्थों में तो उपलब्ध मिल जाती है परन्तु उनका वास्तविक प्रादुर्भाव प्रायः ग्रंथों में भी लुप्त ही रहता है। इसी भाँति से काली भाव भी लुप्त है क्योंकि जब कोई नहीं था, तब इन्हें कौन जानता? कैसे जानता? इस पर भी कुछ प्राच्य विशारदों ने इनके ऊपर भिन्न-भिन्न दृष्टि डाली है, जो कि निम्नलिखित भाँति से अलग-अलग है-

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Kali Mata
यह देवी नित्य हैं और अजन्मा हैं तथापि देवकार्य सम्पन्न करने के निमित्त जब यह अभिन्न रूप से अवतरित होती हैं तब उसी रूप से जानी जाती हैं। कल्प के अन्त में जब समस्त सृष्टि एकार्णव में निमग्न हो रही थी तब भगवान विष्णु क्षीरसागर में, शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा का आश्रय लेकर निद्रामग्न हो गये थे। ऐसे समय पर उनके कानों की मैल से दो भयानक असुर उत्पन्न हुये, जो कि मधु तथा कैटभ के नाम से विख्यात हुए। यह दोनों ही ब्रह्मा को खाने के लिये अग्रसर हुये। भगवान की नाभि कमल पर स्थित ब्रह्मा यह दृश्य देखकर विचलित हो उठे। उन्होंने भगवान को अत्यधिक पुकारा, परन्तु वह सोये रहे। तब उन्हांने आद्यभवानी की स्तुति की जिसके फलस्वरूप भगवान के नेत्र, मुख, नासिका, बाहु, हृदय तथा वक्षस्थल से निकलकर काली जी उनके समक्ष खड़ी हो गयीं।

काली माता (KALI MATA) की कहानी 

एक अन्य वृतान्त भी पाया जाता है, जिसके अनुसार चण्ड-मुण्ड से युद्ध करते हुये अम्बिका को अतिशय क्रोध उपजा, जिससे उनका मुखमण्डल काला हो गया। ललाट पर भौंहे टेढ़ी हो गयी तथा वहाँ से तत्क्षण विकरालमुखी काली का प्रादुर्भाव हुआ। महर्षि वाल्मीकि ने रामायण लिखी थी जो कि सर्वविदित है। इन्होंने एक और गुप्त रामायण लिखी थी जिसे कि अद्भुत रामायण कहते हैं। अद्भुत रामायण के अनुसार सहस्रमुखी रावण से युद्ध करते हुए भगवान राम मूर्च्छित हो जाते हैं। सीता जी उन्हें मृत हुआ समझ कर अतिशय क्रोध करने के कारण काली हो जाती हैं और सहस्रमुखी रावण का वध कर देती हैं। .इनके भव्य श्रीविग्रह आसाम, बंगाल में अत्यधिक दृष्टिगोचर होते हैं। जालन्धर-पीठ पर ’चामुण्डा देवी’ नामक श्रीविग्रह इन्हीं का स्वरूप है। 


काली माता (KALI MATA) ध्यान  मंत्र 

करालवदनां घोरा मुक्तकेशी चतुर्भूजाम्। 
कालिकां दक्षिणां दिव्यां मुण्डमाला विभूषिताम्
सद्यश्छिन्नशिरः खंगवामाधोर्द्धवकराम्बुजाम्। 
अभयं वरदञ्चैव दक्षिणाधोर्द्धवपाणिकाम्। 
महामेघप्रभां श्यामां तथा चैव दिगम्बरीम्। 
कण्ठावसक्तमुण्डालीगलद्रुधिरचञ्चिताम् । 
कर्णावतंसनानीतशवयुग्मभयानकाम् ।
 घोरदंष्ट्राकरालास्यां पीनोन्नतपयोधराम्। 
शवानां करसंघातैः कृतकाञ्ची हसन्मुखीम्। 
सृक्कच्छटागलद्रक्तधाराविस्फूरिताननाम्। 
घोररावां महारौद्रीं श्मशानालयवासिनीम्। 
बालार्कमण्डलाकारलोचनत्रितयान्विताम् । 
दन्तुरां दक्षिणव्यापिमुक्तालम्बिकचोच्चयाम्। 
शवरूपमहादेवहृदयोपरि संस्थिताम्। 
शिवाभिद्यररावाभिश्चतुर्दिक्षु समन्विताम्। 
महाकालेन च समं विपरीतरतातुराम्। 
सुखप्रसन्नवदनां स्मेराननसरोरुहाम्॥ 

काली माता (KALI MATA) भयंकर  मुखवाली, घोरा, खुले बालों वाली, चार हाथों से और मुण्डमाला से अलंकृत हैं। उनके बायीं तरफ के दोनों हाथों में तत्काल काटे गये शव का सिर एवं खंड और दक्षिण तरफ के दोनों हाथों में अभय और वरमुद्रा सुशोभित हैं । कण्ठ में मुण्डमाला है, काले मेघ के समान श्यामवर्ण हैं, दिगम्बरी हैं । कण्ठ में स्थित मुण्डमाला से टपकते हुए रुधिर से लिप्त शरीर वाली हैं। घोर दंष्ट्रा हैं, करालवदना हैं और उन्नत पीनस्तन वाली हैं। उनके दोनों कानों में मृतक के मुण्ड भूषण रूप से शोभा पा रहे हैं। देवी की कमर में शव के हाथों की करधनी विद्यमान है। वह हास्यमुखी हैं। उनके दोनों होठों से रुधिरधारा क्षरित हो रही है जिसके कारण हृदय कम्पित होता है। देवी घोर शब्द करने वाली हैं, महाभयंकरी हैं, और यह श्मशानवासिनी हैं। उनके तीनों नेत्र नवीन सूर्य के समान हैं। वह बड़े दाँत और लम्बे लहराते केशों से युक्त हैं। वह शवरूपी महादेव के हृदय पर स्थित हैं। उनके चारों ओर गीदड़ियाँ भ्रमण करती हैं। देवी महाकाल के सहित विपरीत रता (अर्थात् मैथुन) में आसक्त हैं। वह प्रसन्नमुखी सुहास्यवदना हैं और समस्त कामनाओं की दात्री हैं। 

काली माता (KALI MATA) मंत्र 

क्रीं क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं हूं  हूं दक्षिणेकालिके क्रीं क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं हूं हूं स्वाहा। 

काली माता | KALI MATA - भक्त की रक्षा करने वाली काली माता | KALI MATA - भक्त की रक्षा करने वाली Reviewed by तांत्रिक रहस्य on December 09, 2019 Rating: 5

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